POEM
Dr.Taruna Mathur
संसार एक स्वप्न है, चेतना का प्रतिरूप,
जहाँ हर अनुभव क्षणिक, हर सुख-दुःख स्वरूप।
यहाँ जो स्थायी दिखे, वह भी बदल जाता है,
समय के प्रवाह में सब मिटकर रह जाता है।
मनुष्य दौड़ता रहता है, माया की परछाई के पीछे,
पर सत्य तो भीतर छिपा, उस शांति को सींचे।
संसार न अच्छा न बुरा, बस दृष्टि का खेल है,
जो समझे इस माया को, बाहर है वही नहीं तो जेल है।
यहाँ आसक्ति ही बंधन, और त्याग ही मुक्ति है,
जो भीतर झाँक सके, वही सच्ची भक्ति है।
संसार को समझो नहीं, बस उसे होने दो,
क्षण को अनुभव बनाओ, और स्वयं में खोने दो।
डॉ तरुणा माथुर
(कवयित्री केंद्रीय विद्यालय, बड़ौदा में कला शिक्षिका है)

